Monday, August 24, 2009

मै और मेरा ईश्वर

आज बहुत झगडी अपने ईश्वर से ,
वो जब मुझे जानते है ,
समझते है मेरी व्यथा को ,
तो क्यों नही सुनते मेरी कथा को ....

ईश्वर जिन्हें मै तलाश करती हूँ किसी आकार मे,
आज कहते है मै निराकार हूँ ,
न मन्दिर में मिलते हैं न
मस्जिद में ,और कहते है मैं तुम्हारे पास हूँ ....

मै एक सामान्य मनुष्य कैसे समझू
कि हे ईश्वर तुम क्या हो ? कहाँ हो?
तुम भव्य पूजनीय विधाता हो ?
या मेरी आत्मा के परमात्मा हो ?

3 comments:

stylemaker said...

Dear Bhidu,
So, your exploring mission is still ON?
Well, you should do...

Please visit http://dhirenprint.blogspot.com/

DEEPMALA* said...

Aapke vichar anmol hai ,
jo aapne apni kavita me utare hai.................
FROM :-HEENA RANA

चंदन कुमार झा said...

सार्थक प्रश्नों का ढ़ूढ़ती कविता । बहुत सुन्दर प्रियंका । सुन्दर भावनाओ को शब्द रूपी दिशा देती रहे । आभार